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बढ़ती गर्मी में आशा कार्यकर्ता

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यह रिपोर्ट हरियाणा में मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) कार्यकर्ताओं पर अत्यधिक गर्मी के प्रभावों का एक व्यापक अध्ययन प्रस्तुत करती है, जिसमें उनकी कार्य स्थितियों, स्वास्थ्य चुनौतियों और संस्थागत समर्थन का पता लगाया गया है। इस अध्ययन में 86 आशा कार्यकर्ताओं के सर्वे के साथ-साथ गहन साक्षात्कार और फील्ड ऑब्ज़र्वेशन का उपयोग किया गया है। इसके निष्कर्ष बताते हैं कि गर्मी का असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की एक बेहद ज़रूरी लेकिन कम आंकी गई स्वास्थ्य कार्यकर्ता श्रेणी की अस्थिरता और अनदेखेपन को भी बढ़ाता है।

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मुख्य निष्कर्ष:

जनसांख्यिकी और काम का बोझ: सर्वे में शामिल ज़्यादातर आशा कार्यकर्ता अनुभवी महिलाएँ हैं (अधिकतर की उम्र 30–60 साल के बीच है), जो मुख्य रूप से सोनीपत और रोहतक के ग्रामीण इलाकों में काम करती हैं। लगभग सभी ने बताया कि आशा का काम ही उनका मुख्य पेशा है, जो उनकी आजीविका में इसकी अहम भूमिका को दिखाता है। हालांकि, उनकी कमाई अभी भी कम और अनियमित बनी रहती है।

गर्मी का प्रभाव और उससे बचनेके तरीके: ज़्यादातर आशा कार्यकर्ता रोज़ 6–10 घंटे बाहर काम करती हैं, जिनमें से 83.7% सबसे ज़्यादा गर्मी वाले समय में भी काम करती हैं। उनका मुख्य साधन पैदल चलना है।गर्मी के दौरान आशा कार्यकर्ता अक्सर अपना काम जल्दी शुरू करती हैं, कम ब्रेक लेती हैं या काम के घंटे घटा देती हैं, लेकिन इसका असर उनकी आमदनी या स्वास्थ्य पर पड़ता है। सिर्फ 37.2% को पीने के पानी की सुविधा मिलती है, और लगभग एक-तिहाई के पास बुनियादी कार्यस्थल सुविधाएँ भी नहीं हैं।

मुख्य निष्कर्ष:

गर्मी से बचने के ज़्यादातर तरीके अनौपचारिक हैं—जैसे धूप से बचने के लिए दुपट्टा इस्तेमाल करना या आराम और पानी के लिए दूसरों की मदद पर निर्भर रहना। यह साफ दिखाता है कि संस्थागत स्तर पर सहयोग की काफी कमी है।

स्वास्थ्य पर प्रभाव: काफी बड़ी संख्या में आशा कार्यकर्ताओं ने डिहाइड्रेशन (68%), थकावट (67%), और पेट या त्वचा से जुड़ी समस्याओं (55%) की शिकायत की। चिंताजनक रूप से 23% ने हीट स्ट्रोक होने की बात भी कही।हालांकि मानसिक स्वास्थ्य पर औपचारिक सर्वे नहीं किया गया, लेकिन कई कार्यकर्ताओं ने अपनी बातों में इसके असर का ज़िक्र किया। गर्मी के कारण माहवारी से जुड़ी दिक्कतें भी बढ़ जाती हैं। वहीं, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और आय कम होने के डर के कारण, वे इलाज लेने से भी हिचकिचाती हैं। आर्थिक दबाव: 80% से अधिक आशा कार्यकर्ताओं को गर्मियों में खाने, पानी, बिजली और गर्मी से जुड़ी बीमारियों के इलाज पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है। लगभग 40% हर महीने ₹2,000 से अधिक सिर्फ गर्मी से जुड़ी समस्याओं के इलाज पर खर्च करती हैं।घर के काम और बाहर के काम की दोहरी ज़िम्मेदारी के कारण वे अक्सर काम के घंटे कम कर देती हैं, जिससे उनकी आय और भी अस्थिर हो जाती है।

संस्थागत कमियाँ और कार्यकर्ताओं की मांगें: ठंडक की व्यवस्था, पीने के पानी, साफ शौचालय, छाया और आराम की जगहों जैसी बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। लगभग दो-तिहाई आशा कार्यकर्ताओं ने इन सुविधाओं में सुधार की मांग की है।लंबे समय के लिए उनकी प्रमुख मांगों में उचित वेतन, हरित क्षेत्र (ग्रीन स्पेस), बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ, बीमा, सामाजिक सुरक्षा और उन योजनाओं में उनकी भागीदारी शामिल है जो उनके काम और स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।

संरचनात्मक बाधाएँ और बदलाव की ज़रूरत: कार्यकर्ताओं के अनुभव बताते हैं कि कई बार उनका अनौपचारिक और दर्ज किया गया काम भी बिना भुगतान के रह जाता है। डिजिटल भुगतान प्रणाली में देरी और पारदर्शिता की कमी है। साथ ही, उन्हें लैंगिक भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ता है, और आवाज़ उठाने पर डराया-धमकाया भी जाता है।“वॉलंटियर” का दर्जा व्यवहार में सही नहीं है, क्योंकि काम से मना करने पर नौकरी से निकालने की धमकी मिलती है। उनकी मुख्य मांगों में तय और उचित मानदेय, नियमित नौकरी का दर्जा, मातृत्व और मेडिकल छुट्टी, पीएचसी में बुनियादी सुविधा में सुधार, और जलवायु के अनुसार जरूरी कदम शामिल हैं।


यह अध्ययन दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन से बढ़ती गर्मी, आशा कार्यकर्ताओं के पहले से मौजूद उपेक्षा और समस्याओं को और ज्यादा बढ़ा देती है।

कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में तुरंत और लंबे समय के सुधार—जैसे उचित भुगतान, काम के अधिकार, बेहतर बुनियादी सुविधाएँ और नीतियों में बदलाव—बहुत ज़रूरी हैं। इससे न सिर्फ सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के स्वास्थ्य और सम्मान की रक्षा होगी, बल्कि बढ़ती गर्मी के बीच एक प्रभावी और समान सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था बनाना भी संभव होगा।

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